स्वामी विवेकानंद का दिव्य चरित्र part -1

हम बात करने वाले हे एक ऐसी व्यक्ति जिसकी प्रतिभा अशाधारण हैं,ज्ञान जिसका सदोहर हैं, विवेक,आदर्श और संयम जिसकी पूजा करते हो,विनयशील जिसका व्यक्तित्व हो,दुनियां में सबके लिए उनका व्यक्तित्व आदर्श और अनुकरणीय बन गया वो महापुरुष और कोई नही, बल्की हम सबके प्रेरणास्त्रोत (role model) नरेंद्र नाथ (स्वामी विवेकानंद)के महत्व पूर्ण जीवन के बारे में।

इस लेख में स्वामी विवेकानंद का बचपन , उनका परिवार,बचपन की कहानियां और स्वामी विवेकानंद के प्रेरक विचार के बारे में जानकारी मिलेगी।


कोई भी व्यक्ति को जीवन में सफलता हासिल करनी हो ओर जीवन में आगे बढने की प्रेरणा महापुरुषों के जीवन से ही मिलती हैं।कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने सही रास्ते पर चलकर महान उपलब्धि हासिल की हो,वो हमारे लिए एक महापुरुष समान हैं।भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहां हैं,की जहां कही भी किसी गुण का अत्यंत विकास हुआ है, उस व्यक्ति में ईश्वर का वास होता हैं, उसको पुण्य दृष्टि से देखना चाहिए और उस व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए।

◉ स्वामी विवेकानंद के बारे में ◉
(Short information of swami vivekananda)

पूरा नामनरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त
घरेलू नामनरेंद्र और नरेन
मठवासी बनने के बाद नामस्वामी विवेकानंद
जन्म दिनांक12 जनवरी,1863
जन्म स्थानकलकत्ता,पश्चिम बंगाल
पिता का नामविश्वनाथ दत्त
माता का नामभुवनेश्वर देवी
दादा का नामदुर्गाचरण दत्त
गुरु का नामरामकृष्ण परमहंस
भाई – बहन10 (4 भाई और 6 बहन)
विवाहविवाह नहीं किया
विद्यालय का नामईश्वरचंद विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान
महाविधालय का नामप्रेसिंडेंसी कॉलेज,जनरल असेंबली इंस्टीट्यूट,कोलकता (अब, स्कोर्टिच चर्च कॉलेज)
शैक्षिक योग्यताB.A (1884)
संस्थापकरामकृष्ण मठ,रामकृष्ण मिशन
दर्शन (philosophy)राजयोग,आधुनिक वेदांत
साहित्यिक कार्यराज योग,कर्म योग,भक्ति योग,मेरे गुरु,अलमोंडा से कोलंबो तक दिए गए व्याख्यान
अन्य महत्वपूर्ण कार्यन्यूयॉर्क में वेदांत सिटी की स्थापना,केलिफोर्निया में शांति आश्रम और भारत में अलमोंडा के पास एक “अद्वैत आश्रम” की स्थापना
कथन“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ती ना हो जाए”।
धर्म हिंदू
राष्ट्रीयताभारतीय
मृत्यु दिनांक4 जुलाई,1902 (39 वर्ष)
मृत्यु स्थानबेलूर मठ,पश्चिम बंगाल
                          
नरेंद्रनाथ(स्वामी विवेकानंद) का जन्म 
12 जनवरी,1863 के मकर संक्रात्री (संवत 1920)के दिन सोमवार की सुबह 6:33 सूर्योदय से पहले कलकत्ता के गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट में सभ्य और समृद्ध बंगाली दत्त परिवार में हुआ था।उनका परिवार सामाजिक कार्य और मानव हित के लिए कार्य करने के लिए जाने जाते थे।स्वामी विवेकानंद का बचपन का घर का नाम वीरेश्वर था।उनका औपचारिक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।उनको बचपन में नरेन और नरेंद्र नाम से लोग पुकारते थे।

स्वामी विवेकानंद की बचपन की  कहानियां 

नरेंद्र नाथ बचपन से ही तेज दिमांग के थे, निडर थे और पढने के साथ साथ,ही नरेंद्र अव्वल दर्जे के सेतान भी थे।साथ ही नरेंद्र दुर्बल बच्चों की सहायता भी करते थे,नरेंद्र का मानना था की किसी भी व्यक्ति की सहायता करना सबसे बडा धर्म हैं।नरेंद्र बचपन से ही महाभारत, रामायण जेसे ग्रंथो को पढने में रुचि रखते थे।

नरेंद्र की प्रमाणिकता

नरेंद्र नाथ बचपन से ही प्रभावशाली थे।साथ ही ईमानदार भी थे और नरेंद्र किसी भी चीज को देख ले या फिर किसी भी व्यक्ति की बात एक बार सुन लेते फिर वो कभी नहीं भूलते थे।ये बात तब की हैं,जब नरेंद्र नाथ स्कूल में थे।

जब स्कूल में एक ब्रेक के दौरान नरेंद्र नाथ अपने दोस्तो के साथ किसी विषय में बात कर रहे थे,तब सभी बच्चे अपने दोस्त नरेंद्र की बात पर ध्यान मग्न होकर सुन रहे थे।इसी दौरान कक्षा में अध्यापक ने प्रवेश किया और पाठ को पढाना शुरू कर दिया तब किसी भी बच्चें को पता ही नहीं था की कक्षा में अध्यापक आ चुके हैं और पाठ पढाना शुरू कर दिया है।जब अध्यापक का ध्यान कक्षा में बैठे बच्चों पर गया ,तब अध्यापक को महसूस हुआ की कक्षा में बैठे किसी भी विद्यार्थी का ध्यान पढने में नहीं है और आपस मैं ही बाते करने में हैं।

अध्यापक ने सारे बच्चों को प्रश्न पूछना शुरू कर दिया,पूछा की में कक्षा में क्या पढा रहा था वो किसी को भी पता हे क्या, किसी को भी अध्यापक क्या पढा रहे थे उसमे ध्यान ही नही था,बल्की नरेंद्र बात कर रहे थे उसमे ध्यान था। इसलिए किसी भी बच्चे को अध्यापक ने प्रश्न पूछा उसका उत्तर नहीं आता था।परंतु,जब नरेंद्र को अध्यापक ने प्रश्न पूछा तब नरेंद्र ने सही-सही उत्तर दे दिया। नरेंद्र अपने दोस्तो के बात करते समय कभी  कभी अध्यापक क्या पढा रहे है,उसमे भी ध्यान दे दिया करते थे इसलिए उन्होंने प्रश्न का उत्तर आता था।नरेंद्र का उत्तर सुनकर अध्यापक काफी खुश हुए।

फिर अध्यापक ने सारे बच्चों को पूछा कि कक्षा में कोन बातचीत कर रहा था,तब सारे बच्चे ने नरेंद्र नाथ तरफ इशारा किया। किंतु,अध्यापक को बच्चों का उत्तर सुनकर गुस्सा आ गया,क्युकी नरेंद्र ने प्रश्न का उत्तर सही दिया था।फिर अध्यापक ने नरेंद्र को छोडकर सारे बच्चे को बेंच पर खडे होने को कहा,सारे बच्चें के साथ – साथ नरेंद्र भी बेंच पर खडे हो गए।

नरेंद्र को बेंच पर खडे देखकर अध्यापक ने नरेंद्र को कहा की तुम क्यों खडे हो बेंच पर,तुम बैठ जाओ।अध्यापक के मना करने के बाद भी नरेंद्र बेंच पर खडे रहे।नरेंद्र ने कहा की,माफ कीजिएगा गुरुजी,
मुझे सजा जरूर मिलनी चाहिए क्यूंकि,में ही कक्षा में बैठे सारे बच्चों के साथ बात कर रहा था,ओर सब बच्चें तो सुन रहें थे।इसमें किसी का भी दोष नहीं है।

नरेंद्र का उत्तर सुनकर अध्यापक का मन करुणा से भर उठा और अध्यापक की आखों में आसू आ गये।साथ ही सारे बच्चों को बेंच में से नीचे उतरने को      कहा ओर सारे बच्चों को माफ भी कर दिया।

अध्यापक ने बच्चें को कहा की आपका दोस्त नरेंद्र एक दिन जरूर बडा आदमी बनेगा।अध्यापक की इस बात सत्य हुई,नरेंद्र नाम में से स्वामी विवेकानंद नाम पूरे विश्व में प्रख्यात हो गया।

नरेंद्र किसी भी व्यक्ति को मुसीबत के समय सहायता करते थे

ये कहानी उस समय की हे,जब नरेंद्र 6 साल का था।
तब अपने चचेरे भाई के साथ मेले देखने गया था।वहा,मेले में नरेंद्र ने देखा कि सब माता पिता अपने बच्चें को मेले की दुकान से अच्छे – अच्छे और उनके मनपसंद खिलौना खरीद कर दे रहे हैं।

नरेंद्र ने खिलौना की दुकान पर जाकर देखा की कैसे कैसे खिलौने है।तब उनकी की नजर खिलौनों की दुकान में रखा एक शिवलिंग पर पडी ओर उसे ये शिवलिंग काफी पंसद आया, इस शिवलिंग की कीमत 2 रुपिये थी।फिर नरेंद्र ने दुकानदार को 2 रुपिये देकर शिवलिंग को खरीदा, फिर नरेंद्र ने देखा की उनकी पास सिर्फ 1 चव्वनी ही बची हैं।

तभी मेले में एक रोते हुए बच्चे को देखा।नरेंद्र ने उस रोते हुए बच्चें के पास जाकर पूछा की तुम क्यों रो रहे हो?तभी उस बच्चें ने नरेंद्र को कहा की उसकी मां ने मेले में से खिलोने खरिदने के लिए 1 चव्वनी दी थी। मेले में घूमते समय वो चव्वनी कहीं गिर गय है।में यह बात अपनी मां को बताऊंगा तो वो मुझे मारेंगी।तभी नरेंद्र ने कहा की तुम मेरी चव्वनी रख लो।चव्वनी देकर नरेंद्र वहा से चला गया और वो बच्चा बहुत खुश हुआ।

➜जब नरेंद्र रास्ते पे चलके जा रहा था,तब उसने देखा कि एक मोटर बडी तेजी से आ रही थी ओर उस रास्ते पे एक बच्चा बेखबर आ रहा था, उस बच्चें को पत्ता ही नहीं था के उसके सामने मोटर आ रही है।
तभी मोटर पास आती है, फिर नरेंद्र उस बच्चे को खींचकर बचा लेते हैं।

जब नरेंद्र उस बच्चे को बचा रहे थे ,तब उसके हाथ में खरीदा हुआ 2 रूपिये का शिवलिंग उसके हाथसे छूट जाता है और वो शिवलिंग जमीन पर गिरकर टूट जाता हैं।

यह सब देखकर कुछ लोग उसी स्थान पर इक्ट्ठा हुए और कहने लगे की बिचारे ने कितना अच्छा शिवलिंग कितने पैसे देकर खरीदा था।शिवलिंग टूट गया और कितना नुकसान हो गया बिचारे बच्चें का।

फिर नरेंद्र ने विनम्रता से कहा की इंसान की जान की किंमत कोय लगा नहीं सकता,यह शिवलिंग तो सिर्फ 2 रुपिया का ही तो हैं।शिवलिंग टूटा तो क्या    हुआ,किंतु हमे किसी भी व्यक्ति की जान बचाना हमारा प्रथम कर्तव्य मानना चाहिए।इसीलिए मेने शिवलिंग टूटने की परवाह किए बिना उस बच्चें की जान बचाई।

अगर कोई भी व्यक्ति किसी मुसीबत में हे तो उसे  बचाना हमारा परमकर्तव्य होना चाहिए।नरेंद्र बचपन सेे ही दयालु थे और किसी भी दिन दुखी की सहायता करते थे

नरेंद्र को खेल कूद से लगाव था


नरेंद्र बचपन से ही पढने में तेज थे।बचपन में काफी सरारती भी थे।उसको खेलकूद करना और मस्ती करना काफी पसंद था। पेंड पर चडना ओर उस पर जुला जलने में काफी आनंद आता था।

ये कहानी उस वक्त की हे,जब नरेंद्र 8 साल के थे तब वो अपने दोस्त के घर गए थे, उसके दोस्त के घर में एक चंपक का पैड था। कहते हैं, कि शिवभक्त घर में चंपक का पैड लगाते हैं।नरेंद्र भगवान शिव के आराध्य थे।इसलिए,उसको पैड बहुत अच्छा लगता था।एक बार नरेंद्र उनके दोस्त के घर पर गए तब इस पैड पर चडे थे और उस पर जुला जुल रहे थे।

वो पैड पर जुला जुल रहे थे और उनके हंस ने बोल ने की आवाज हो रही थी,तब उनकी आवाज को सुनकर दादाजी को लगा कि कोई पेड पर चढा है।दादाजी को कम दिखाई दे रहा था,उसको सुनाई अच्छा दे रहा था। उनकी आवाज सुनकर दादाजी को लगा की पैड की शाखाओं और फूलो कोई नुकसान न पुहचाई इसलिए दादाजी ने नरेंद्र को पैड पर से नीचे उतर जाने को कहा।दादाजी जी को यह बात का भी डर था की,कही बचे पैड पर से नीचे गिर न जाई ओर उसे चोट न लग जाए इसलिए दादाजी ने बच्चें को कहा की दोबारा वो पैड पर ना चढें।फिर,नरेंद्र ने दादाजी को पूछा की क्यों पैड पर ना चढें,इसलिए दादाजी को लगा की क्यूना बचें को किसी खतरनाक चीज से डराया जाई ,तो बचे डरके मारे फिर पैड पर नहीं चढेगा।दादाजी ने कहा की इस पैड पर ब्रह्मदेत्य रहता है,वो पारदर्शी हे इसलिए वो दिखता नहीं है ,किंतु पैड पर चढने वाले की गर्दन तोड देता है।इस प्रकार कहकर दादाजी ने सोचा कि बचें इस बात से डर कर पैड पर से नीचे उतर जायेगे,दादाजी ये बात कहकर वापस चले गए।

बिना तर्क के विश्वास ना करने की आदत ने डर से बचाया  

दादाजी के जाने के बाद नरेंद्र मुस्कुराया और फिर से जुला जलने में मग्न हो गया।उसके साथ उनका दोस्त भी खडा था और सब बातचीत को सुन रहा था ओर दादाजी की बात से वो डर गया।उसने नरेंद्र को कहा की ,तुम क्यों नहीं पैड पर से नीचे उतर जाते हो,क्या तुम को डर नही लग रहा है ब्रह्मदत्य से।नरेंद्र ने कहा की बिना सोचे समजे किसी की बात को यकीन नहीं करना चाहिए, क्यूंकि किसीने तुमको वो बात बताए हैं।उस बात को सोचों समजो।क्या तुम्को अभी भी नही समज आ रहा है कि,जब पेड पर ब्रह्मदत्य होता तो,में जुला काफी समय से जुल रहा हु तो,ब्रह्मदत्य काफी समय पहले ही मेरी गर्दन को तोड चुका होता। तर्क पर आधारीत ये घटना साबित करती है कि,नरेंद्र बचपन से ही बुद्धिमान और साहसिक थे।

नरेंद्र ने किया था साधु को प्रश्न 

एक बार ऐसा हुआ की कोई साधु भजन गाते गाते उसके घर के द्वार पर आया।उनके द्वार पर आने वाले साधु ने नरेंद्र से एक कपडे देने की प्रार्थना की। उन्होंने एक नहीं मंहगी चादर किसीको घर में पूछे बिना उस साधु को दे दी।साथ ही नरेंद्र ने साधु से एक प्रश्न भी पूछा – की आपने भगवान को देखा है। उस साधु ने भी बडा विचित्र ही उत्तर दिया।

साधु का भी उत्तर था असाधारण 

नन्हे नरेन के प्रश्न के उत्तर में साधु ने कहा की,मेरे पूर्व जन्म के अच्छे कर्म नहीं की,मूजे इस जन्म में भगवान के दर्शन का परम आनंद का अवसर मिले।किंतु, तुम्हारी आखों में अलौकिक दिव्यता को देखकर में कह सकता हूं,की तुमे इस जन्म में भगवान के दर्शन जरूर होगें।

नरेंद्र के माता भुवनेश्वरी देवी ओर पिता विश्वनाथ दत्त दान पुण्य के खिलाफ नहीं थे।किंतु,किसीको क्या दान में देना वो सोच समजकर देना चाहिए और किसीको क्या दान देना उसका भी ख्याल रखना पडता हैं।किंतु, नरेंद्र इन सब बात से ऊपर थे।

कहते की उनकी दानशीलता की वजह से जब कोई फकीर उनके द्वार पर आता तो उनके घरवाले नरेंद्र को कमरे में बंद कर देते थे।इस डर से की, नरेंद्र कोय भी मंहगी चीज आनेवाले फकीर को न दे।परंतु, नरेंद्र खिडकी से फकीर को कोय भी मंहगी चीज फेक देते थे।

नरेंद्र को साधु और फकीर के लिए करुणा थी।साथ ही उसको जीव – जंतु के प्रत्ये भी करुणा थी।उसने बचपन में बकरी,बंदर, मोर,कबूतर जेसे पक्षियों और जानवरों को पाल रखा था।माता – पिता इन सब नरेंद्र के कामसे काफी परेशान भी होते थे।घरवाले इन सबसे डर जाते थे।परंतु, नरेंद्र को किसी भी जानवर या फिर पक्षी हो ,वो किसी से नहीं डरते थे और नहीं किसी घरवाले की बात को सुनते थे।

नरेंद्र को काबू पाने के लिए मां ने की एक तरकीब 

नरेंद्र काफी सरारते करते थे और नहीं किसी की बात को मानते थे।इन सबसे घरवालों को काफी परेशानी होने लगी,तब नरेंद्र की मां के पास नरेंद्र को काबू पाने के लिए एक तरकीब थी,इस तरकीब से मां नरेंद्र पर काबू पा लेती थी।जब भी नरेंद्र काफी सरारत करते तब उनकी मां कहती की,तुम सरारते करोंगै तो तुमको महादेव कैलाश पर्वत पर नहीं जाने देंगे।इन बात को सुनते ही,नरेंद्र शांत हो जाते थे।उसकी
मां की इस बात सुनते ही क्यूं 5 – 6 साल का बच्चा नरेंद्र शांत हो जाते थे,ये तो विधाता ही जाने।

नरेंद्र नाथ(स्वामी विवेकानंद) का परिवार 

स्वामी विवेकानंद के बारे में तो हम सब बहुत कुछ जानते हैं।किंतु,हमे उनके परिवार के बारे में कम जानकारियां मिलती है।
                     

                 विश्वनाथ दत्त


नरेंद्र के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था।वे प्रसिद्ध और सफल वकील थे।वह कलकत्ता में स्थित उच्च न्यायालय में अटॉर्नी- एट -लॉ पद पर थे।वो पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे।वे अपने पुत्र को अंग्रेजी पढाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग से ही जीवन व्यतीत कराना चाहते थे।उनकी अंग्रेजी और फारसी भाषा में भी अच्छी पकड थी।

                    भुवनेश्वरी  देवी


नरेंद्र के माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।
उनकी माता दयालु,धार्मिक विचारों वाली,
प्रतिभाशाली ओर बुद्धिमानी महिला थी।उन्हें महाभारत,रामायण जेसे ग्रंथो का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था।उनको अंग्रेजी भाषा में भी काफी अच्छी समज थी।अपने पिता व्यवसाय में काफी व्यस्त रहते थे,इसलिए नरेंद्र अपनी मां की छत्रछाया में ही पले बढे हैं।वे घर में ही ध्यान में तल्लीन हो जाया करते थे।इसके साथ नरेंद्र ने अपने मां से भी शिक्षा प्राप्त की।

स्वामी विवेकानंद के दादा का नाम दुर्गा चरण दत्त था।
वे बहुत धनाघ्य व्यक्ति थे।उन्हें संस्कृत,
फारसी,उर्दू,जैसी भाषा में अधिक समझ थी।उनको कई भाषा का विद्वान माना जाता था।उनको धार्मिक विषय में अधिक रुचि थी।किंतु,उन्होंने सांसारिक वस्तुओं से मोह त्यागकर 25 वर्ष की अल्प आयु में ही सन्यास धारण कर लिया था।

➜विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी को 10 संतान हुई।10 संतान में से ज्यादा की तो अल्प आयु में ही मुत्यू हो गई।एक बहन ने युवावस्था में आत्महत्या कर ली थी।10 संतान में से केवल 4 ही संतान जीवित बच पाई।
 
• पहली संतान पुत्र थी जो केवल 8 महीना ही जी पाया।
• दूसरी संतान जो एक पुत्री थी,वो 2.5 साल जी पाईं।
• तीसरी संतान पुत्री थी,उसका नाम हरामोनी देवी था।वो 22 साल तक ही जी पाईं।

                       स्वर्णमयी देेेवी


•परिवार की चौथी संतान स्वर्णमयी देवी थी। उनकी मुत्यु 72साल की उम्र में हुई थी।छोटे नरेंद्र उनके साथ ज्यादा समय रहे ओर नरेंद्र नाथ उनके साथ सरारते भी किया करते थे।

•पांचवी संतान भी एक लडकी थी,जो 5 साल से ज्यादा नहीं जी पाईं।

•छठी संतान नरेंद्र नाथ(स्वामी विवेकानंद)थे।जो सन् 1902 तक 39 वर्ष की उम्र तक जिए।

•सातवी संतान किरणबाला देवी थी।जो 16 या 18 साल की उम्र तक ही जीवित रहीं।

•आठवी संतान जोग्रिद्रबाला देवी थी।जिन्होंने 25 साल की उम्र में 1881 में सिमला में आत्महत्या कर ली।
                      
           
                  महेंद्रनाथ दत्त

•नवमी संतान भी एक पुत्र था।उसका नाम महेंद्र नाथ दत्त था।जिसका जन्म सन् 1869 में हुआ था।उन्होंने लंदन म्यूजियम में पढाई की।उन्हें विविध विषयों में रुचि थी और उन्होंने काफी अध्ययन किया।दार्शनिक और सामाजिक चिंतक भी रहे साथ ही कलाकार,फिलानथ्रोपिस्ट ओर अर्थशास्त्री थे।उन्होंने महसूस किया की विवेकानंद में अदभुत देवीयशक्तियां मौजूद हैं।वो बचपन से ही रामकृष्ण मिशन और स्वामी विवेकानंद के काम के साथ जु़ड गए थे।वे अपने भाई के साथ लंबे समय तक रहे।महेंद्र नाथ भी लगातार भारत और विदेश की यात्राएं करते थे।महेंद्र नाथ का निधन 1956 में हुआ।

                   भूपेंद्रनाथ दत्त


•दशमी संतान एक पुत्र था।जिसका नाम भूपेंद्र नाथ दत्त था।इसका जन्म 4 सितंबर 1880 में हुआ था।वो युगांतर पत्रिका के संपादक थे,जो क्रांतिकारियों को पैरोकार पत्रिका मानी जाती थी।भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध क्रांतिकारी और समाजशास्त्री थे।वो लेखक भी थे,उन्होंने भारतीय संस्कृति और समाज पर कई किताबे लिखी।उन्होंने अपने भाई स्वामी विवेकानंद पर भी एक किताब लिखी।उनको 1907 में अंग्रेजो ने गिरफ्तार भी किया था। वो एक साल तक जेल में भी रहे।1908 में उन्होंने भारत छोड दिया और वे अमेरिका चले गए।वहां उन्होंने ब्राउन यूनिवर्सिटी से एमए की पढाई की।इसके बाद केलिफोर्निया में गदर पार्टी में ज्वाइन किया।यहां से वो जर्मनी चले गए।जर्मनी में वो कई संस्था में जूडे।उन्होंने क्रांतिकारी और राजनीतिक गतिविधियां को जारी रखा।हम्बर्ग से उन्होंने एंथ्रोपोलॉजी में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की।1927में भारत लौटकर उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकारी।उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें फिरसे गिरफ्तार किया गया।कोलकत्ता में 81वर्ष की उम्रमें 25दिसंबर, 1961 को उनका निधन हुआ।

स्वामी विवेकानंद के प्रेरक विचार 

1.उठो,जागो और तब तक मत रुको,जब तक कि लक्ष्य की प्राप्ती ना हो जाए।

2.सबसे बडा धर्म अपने स्वभाव के प्रति निष्ठावान रहना।

3.बंधन और भ्रम को दूर करने के लिए,
कार्य और पूजा आवश्यक है।

4.ताकत जिंदगी हैं,कमजोरी मुत्यू हैं
   विस्तार जिंदगी हैं,संकुचन मुत्यू हैं,
   प्यार जिंदगी हैं,नफरत मुत्यू हैं।

5.दुनिया सबसी बडी व्यायामशाला हैं, जहां हम खुदको बनाने के लिए आते हैं।
 
6.भारत के विकास एवं प्रगति में योगदान देना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य हैं।

7.एक समय में एक ही काम करो और इस काम करने के दौरान,अपनी पूरी आत्मा को उसमे लगा दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।

8.जब तक हम खुद पर विश्वास नहीं कर सकते,तब तक हम भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

9.संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है,असंभव के आगे निकल जाना।

10.जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नहीं है,लेकिन जो रिश्ते हैं,उसमे जीवन होना जरूरी हैं।

निष्कर्ष

इस लेख में स्वामी विवेकानंद के बारे में शॉर्ट में जानकारी,स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र नाथ)का बचपन,बचपन की कहानियां,नरेंद्र का परीवार ओर स्वामी विवेकानंद के प्रेरक विचार के बारे में बताया गया हैं।आपको यह लेख केसा लगा ? इस लेख में आपको कोई गलती नजर आए तो हमे बता सकते हैं।हमारे लेख को पढने के लिए धन्यवाद….








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